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सुनील


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एक छोटे सफ़र की छोटी दास्तान

Posted On: 17 Jan, 2013  
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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

के द्वारा: yogi sarswat yogi sarswat

के द्वारा:

नैतिक-सांस्कृतिक अधोपतन पर अत्यंत विचारणीय, पठनीय प्रस्तुति, हार्दिक साधुवाद एवं सद्भावनाएँ ! ज्योतिपर्व की मंगल कामनाएँ ! "लेकिन आंकड़े आज अलग हैं, लक्ष्मी का ये रूप आज हर घर में तिरस्कृत हो रही हैं। अब बेटी लक्ष्मी नहीं कुल्टा, और कुलाक्षिनी कहलाने लगी हैं। लोग स्त्रियों को आज भी लाचार, अबला और दया की दृष्टि से देखते हैं। जबकि धन, शक्ति और बुद्धि का विभाग आज भी देवियों के पास हैं। आज की लक्ष्मी ना सिर्फ समाज में शोषित हो रही हैं, बल्कि अपने घर में भी तिरस्कृत हो रही हैं। दहेज़ के लिए जलाई जा रही हैं, इज्जत के लिए मौत के घाट उतारी जा रही हैं। बदनामी के डर से शिक्षित समाज भी घर की लक्ष्मी को आँगन से बाहर कदम ना रखने पर मजबूर कर रही हैं। अकेले भ्रूण हत्या के मामले भी हम दुनिया से आगे हैं। अब सवाल हैं कैसे जब घर की लक्ष्मी के साथ ही ऐसे व्यवहार किया जाएगा तो बहार से लक्ष्मी कैसे आएगी।"

के द्वारा: Santlal Karun Santlal Karun

के द्वारा: सुनील सुनील

नवीन विचारों की प्रभावपूर्ण प्रस्तुति; हार्दिक साधुवाद एवं सद्भावनाएँ ! "बहन के अपमान पर राज्यवंश और प्राण लुटा देने वाला, शत्रु स्त्री को हरने के बाद भी स्पर्श न करने वाला रावण जैसा भाई ही तो हर लड़की को चाहिए आज, छाया जैसी साथ निबाहने वाली गर्भवती निर्दोष पत्नी को त्यागने वाले मर्यादा पुरषोत्तम सा भाई लेकर क्या करुँगी मैं? जिसने अपने प्यारी बहन शांता के लिए एक बार भी भात्रॄ धर्म ना निभाया हो, उस बहन के लिए जिसने त्याग कर दिया था अपने पिता के लिए अपने आपको, और जिसके प्रताप से आये थे राम इस दुनिया में. और माँ अग्नि परीक्षा, चौदह बरस वनवास, और अपहरण से लांछित बहु की क़तर आहें तुम कब तक सुनोगी और कब तक राम को ही जन्मोगी …..!!!"

के द्वारा: Santlal Karun Santlal Karun




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